प्रयागराज। सरकारी अस्पतालों में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर प्रयागराज में गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि 1 अप्रैल 2026 से सुरक्षा कर्मियों के बढ़े हुए वेतन का सरकारी आदेश लागू होने के बावजूद मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO), प्रयागराज द्वारा बढ़ा हुआ वेतन देने से इनकार किया जा रहा है।
वहीं, शासनादेश में सुरक्षा कर्मियों के रूप में भूतपूर्व सैनिकों को प्राथमिकता/तैनाती से संबंधित प्रावधान होने के बावजूद आरोप है कि पूर्व सैनिकों को सुरक्षा व्यवस्था में रखने के बजाय किसी सिविल संस्था के माध्यम से टेंडर कराने की तैयारी की जा रही है।
बताया जा रहा है कि इस मामले को लेकर पिछले करीब **एक महीने से सरकारी अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित** है। आरोप है कि अस्पताल में न पर्याप्त सुरक्षा कर्मी तैनात हैं और न ही सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी प्रभावी रूप से संभालने वाला कोई जिम्मेदार तंत्र दिखाई दे रहा है। इससे मरीजों, तीमारदारों और अस्पताल के कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है।
मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब शासन स्तर से सुरक्षा कर्मियों के वेतन में बढ़ोतरी का आदेश जारी हो चुका है, तो उसका पालन स्थानीय स्तर पर क्यों नहीं किया जा रहा है? इसी तरह, यदि शासनादेश में सुरक्षा कर्मियों की नियुक्ति को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं, तो उसके अनुरूप व्यवस्था क्यों नहीं की जा रही है?
दो शासनादेश, फिर भी कार्रवाई क्यों नहीं?
इस पूरे मामले में दो महत्वपूर्ण सवाल सीधे तौर पर सामने आते हैं—
पहला सवाल: जब शासन ने 1 अप्रैल 2026 से सुरक्षा कर्मियों के वेतन में वृद्धि का आदेश जारी किया है, तो स्थानीय स्तर पर बढ़ा हुआ वेतन क्यों नहीं दिया जा रहा?
दूसरा सवाल: जब शासनादेश में सुरक्षा कर्मियों की नियुक्ति को लेकर भूतपूर्व सैनिकों से संबंधित स्पष्ट प्रावधान मौजूद हैं, तो उसके बावजूद सिविल संस्था के माध्यम से टेंडर कराने की जरूरत क्यों पड़ रही है?
यदि ये आरोप सही पाए जाते हैं, तो मामला केवल वेतन विवाद या टेंडर प्रक्रिया का नहीं रह जाता, बल्कि शासनादेशों के अनुपालन, प्रशासनिक जवाबदेही और सरकारी अस्पताल में मरीजों की सुरक्षा से सीधे जुड़ जाता है।
अस्पताल में सुरक्षा व्यवस्था कमजोर होना गंभीर खतरा
सरकारी अस्पतालों में रोजाना बड़ी संख्या में मरीज और उनके तीमारदार पहुंचते हैं। ऐसे स्थान पर सुरक्षा कर्मियों की पर्याप्त संख्या में मौजूदगी केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि आपात स्थिति, विवाद, महिला एवं मरीजों की सुरक्षा, अस्पताल की संपत्ति और चिकित्सकीय स्टाफ की सुरक्षा के लिए आवश्यक व्यवस्था है।
ऐसे में यदि करीब एक महीने से सुरक्षा व्यवस्था कमजोर है, तो यह अस्पताल प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
अब जवाबदेही तय होनी चाहिए
मामले में संबंधित अधिकारियों से स्पष्ट किया जाना चाहिए कि—
शासनादेश के बावजूद बढ़ा हुआ वेतन क्यों नहीं दिया गया?
सुरक्षा कर्मियों की नियमित तैनाती क्यों नहीं हुई?
पूर्व सैनिकों की तैनाती से संबंधित आदेश का पालन क्यों नहीं हो रहा?
सिविल संस्था को टेंडर देने की प्रक्रिया क्यों शुरू की जा रही है?
पिछले एक महीने से अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी किसकी है?
मरीजों और कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए तत्काल क्या व्यवस्था की गई है?
सरकारी अस्पताल किसी प्रयोग या प्रशासनिक खींचतान का स्थान नहीं हो सकता। शासनादेशों का पालन और मरीजों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
अब देखना यह है कि स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन इस गंभीर मामले में कब तक हस्तक्षेप करता है और अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था कब तक पूरी तरह बहाल की जाती है।
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