उच्च शिक्षा के लिए सरकार ने एडमिशन पोर्टल शुरू किया है। व्यवस्था बड़ी सुंदर है छात्र घर बैठे रजिस्ट्रेशन करें, कॉलेज चुनें, आवेदन करें और फिर मेरिट लिस्ट का इंतजार करें। सुनने में सब कुछ डिजिटल, पारदर्शी और छात्रहितैषी लगता है। लेकिन इस डिजिटल व्यवस्था में छात्र की जेब भी डिजिटल तरीके से खाली हो रही है, इसकी चर्चा शायद किसी पोर्टल पर नहीं होती।
मामला मध्यप्रदेश के उच्च शिक्षा प्रवेश की ऑनलाइन प्रक्रिया का है। छात्र को कॉलेज में प्रवेश के लिए एमपी ऑनलाइन के माध्यम से आवेदन करना होता है और इसके लिए करीब 250 रुपये शुल्क देना पड़ता है। अब तक तो ठीक है। ऑनलाइन व्यवस्था है, सुविधा है, सिस्टम चलाना है, शुल्क लेना है छात्र किसी तरह मान भी लेता है।
लेकिन असली खेल तब शुरू होता है जब पहली मेरिट लिस्ट में बेचारे छात्र का नाम नहीं आता।
छात्र सोचता है कोई बात नहीं, दूसरी लिस्ट आएगी। फिर दूसरी लिस्ट के लिए आवेदन करना पड़ेगा। आवेदन करो और फिर शुल्क भरो। मान लो दूसरी बार भी नाम नहीं आया तो तीसरे चरण में जाइए। वहां भी आवेदन की प्रक्रिया और शुल्क। तीसरी बार भी किस्मत ने साथ नहीं दिया तो चौथा चरण सामने खड़ा है।
यानी छात्र कॉलेज में एडमिशन लेने आया था, लेकिन व्यवस्था ने उसे ऐसा महसूस करा दिया जैसे वह हर चरण में प्रवेश परीक्षा नहीं, बल्कि अपनी जेब की परीक्षा दे रहा हो।
एक छात्र का नाम पहली सूची में नहीं आया तो वह क्या करे? प्रवेश की उम्मीद छोड़ दे या फिर दोबारा आवेदन करे? स्वाभाविक है कि वह दोबारा आवेदन करेगा। आखिर उसकी पढ़ाई का सवाल है, उसका भविष्य दांव पर है। लेकिन हर चरण में फिर शुल्क देना पड़े तो सवाल उठता है कि यह शुल्क वास्तव में आवेदन प्रक्रिया की लागत है या छात्र की मजबूरी की कीमत?
सरकार डिजिटल शिक्षा और डिजिटल व्यवस्था की बात करती है। पोर्टल बना दिया गया, आवेदन ऑनलाइन कर दिया गया, फीस ऑनलाइन कर दी गई और अब शायद छात्र की जेब भी ऑनलाइन खाली होने लगी है।
मान लीजिए किसी छात्र को चार चरणों तक आवेदन करना पड़ा तो 250 रुपये के हिसाब से उसकी जेब से 1000 रुपये चले गए। किसी के लिए यह रकम मामूली हो सकती है, लेकिन जिस परिवार के घर में फीस भरने के लिए भी पैसे जोड़ने पड़ते हैं, उसके लिए 1000 रुपये भी छोटी रकम नहीं है। ऊपर से कॉलेज की फीस अलग, दस्तावेजों का खर्च अलग, आने-जाने का खर्च अलग और पढ़ाई का खर्च अलग।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर छात्र का नाम पहली सूची में नहीं आया और वह उसी प्रवेश प्रक्रिया के अगले चरण में आवेदन कर रहा है, तो हर चरण में पूरा आवेदन शुल्क दोबारा क्यों? सरकार यदि इसे सुविधा कहती है तो फिर सुविधा की कीमत इतनी बार क्यों?
छात्र तो एक ही है, उसका रजिस्ट्रेशन एक ही है, उसके दस्तावेज वही हैं, उसकी योग्यता वही है और कॉलेज में प्रवेश का उद्देश्य भी वही है। सिर्फ मेरिट सूची का चरण बदल गया। फिर शुल्क बार-बार क्यों बदल जाता है?
ऐसा लगता है जैसे एडमिशन पोर्टल ने एक नया सिद्धांत खोज लिया हो“जिसका नाम लिस्ट में नहीं आया, उसकी जेब लिस्ट में आ जाएगी।”
और छात्र बेचारा सोच रहा है कि कॉलेज में सीट मिलेगी या नहीं, जबकि सिस्टम शायद सोच रहा है कि अगली किस्त कब मिलेगी।
व्यवस्था का उद्देश्य यह होना चाहिए कि अधिक से अधिक छात्रों को सरल, पारदर्शी और कम खर्च में उच्च शिक्षा उपलब्ध हो। लेकिन यदि प्रवेश प्रक्रिया के अलग-अलग चरणों में बार-बार शुल्क देना पड़े तो सरकार को इस व्यवस्था की समीक्षा करनी चाहिए।
कम से कम एक ही प्रवेश सत्र में छात्र से बार-बार आवेदन शुल्क लेने के बजाय एक बार पंजीकरण शुल्क लेकर सभी चरणों में स्वतः पात्रता देने की व्यवस्था की जा सकती है। यदि प्रशासनिक या तकनीकी कारणों से दोबारा आवेदन आवश्यक है तो शुल्क माफ किया जा सकता है या न्यूनतम रखा जा सकता है।
क्योंकि सरकार के लिए 250 रुपये सिर्फ एक आंकड़ा हो सकता है, लेकिन छात्र के लिए वही 250 रुपये कभी किताब बनते हैं, कभी कॉपी, कभी बस का किराया और कभी परीक्षा की फीस।
सरकार कहती है कि वह युवाओं के भविष्य को लेकर गंभीर है। तो फिर युवाओं के भविष्य की पहली सीढ़ी पर ही उनकी जेब क्यों हल्की की जा रही है?
एडमिशन चाहिए तो फीस भरो। नाम नहीं आया तो फिर फीस भरो। अगला चरण आया तो फिर फीस भरो। और अगर किस्मत ने ज्यादा इंतजार कराया तो छात्र शायद यह सोचने लगे कि डिग्री मिलेगी या नहीं, लेकिन ऑनलाइन आवेदन का अनुभव जरूर मास्टर डिग्री के बराबर हो जाएगा।
सवाल सरकार से सीधा है अगर छात्र का आवेदन एक ही प्रवेश प्रक्रिया का हिस्सा है तो हर चरण में 250 रुपये क्यों?क्या यह व्यवस्था छात्रहित में है या छात्र की मजबूरी को शुल्क में बदलने की व्यवस्था?
सरकार को चाहिए कि इस पर जवाब दे और यदि वास्तव में हर चरण में शुल्क लिया जा रहा है तो उसकी वजह सार्वजनिक करे। क्योंकि उच्च शिक्षा का रास्ता पहले ही महंगा है, उसे आवेदन शुल्क के चरणों से और महंगा बनाना शायद “सबका साथ, सबका विकास” का वह अध्याय है जिसे छात्र पढ़ना तो नहीं चाहते, लेकिन जेब से भुगतना जरूर पड़ रहा है।
कहीं ऐसा न हो कि कल छात्र पूछे“सरकार जी, कॉलेज में एडमिशन कब मिलेगा?” और पोर्टल जवाब दे“पहले अगला 250 रुपये जमा कीजिए, फिर बताते हैं!”यही तो डिजिटल शिक्षा का नया अध्याय है ज्ञान बाद में, भुगतान पहले।
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