पिछले लगभग एक दशक से दुनिया भर में और विशेष रूप से भारत में न जाने कौन सी ऐसी बयार चली है, जिसने हर किसी के मन में असुरक्षा की बहुत गहरी, लगभग स्थायी भावना भर दी है। यह असुरक्षा कोई आकस्मिक मनोदशा नहीं है। यह एक सुनियोजित सामाजिक अवस्था है, जो धीरे-धीरे, परत दर परत हम सबके भीतर उतरती चली गई है।
पर जहाँ तक मेरा मानना है, इस असुरक्षा के बीज साल 2008 के अमेरिकी सब-प्राइम क्राइसिस से उपजी वैश्विक आर्थिक मंदी में ही पड़े थे। यह पूंजीवाद की ऐसी विद्रूपता थी, जो अपने ही अंतर्विरोधों से गलती जा रही थी। इस व्यवस्था ने यह साबित किया कि बाज़ार की ताकतें अपने आप को न तो नियंत्रित कर सकती हैं, न ही उन करोड़ों लोगों की रक्षा कर सकती हैं जो इस तंत्र की सबसे कमज़ोर कड़ी हैं।
भारत जैसे कुछ कल्याणकारी लोकतांत्रिक राज्यों ने जैसे-तैसे छोटे-मोटे पैबंद लगाकर कुछ साल निकाल दिए, लेकिन अगर पूरा फैब्रिक ही ख़राब हो तो पैबंद क्या ही कर सकते हैं। वे घाव को सिर्फ़ कुछ देर के लिए ढंक सकते हैं, हमेशा के लिए भरते नहीं। और जब घाव भीतर ही भीतर सड़ता रहे, तो उसकी सड़ांध एक दिन पूरे समाज में फैल जाती है।
उस दौरान दुनिया भर में होने वाले सत्ता परिवर्तनों ने सामाजिक-आर्थिक असुरक्षा की इस आग को बुझाने की बजाय उसे और भड़काना चालू कर दिया। क्योंकि नए-नए सत्तासीन हुए लोग, कहीं न कहीं स्वयं भी उन्हीं या उससे भी बड़ी राजनीतिक असुरक्षाओं से घिरे हुए थे। इसीलिए ख़ुद को सत्ता में बनाए रखने और अपने विपक्षियों को सत्ता से दूर रखने के लिए हर तिकड़म का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। जनता की असुरक्षाओं का निदान करने के बजाए बड़ी बेशर्मी और चालाकी से उसको निचोड़ना शुरू कर दिया। आर्थिक पीड़ा को पहचान की राजनीति में बदल दिया गया। नागरिकों का बेसिक सवाल, धर्म, जाति और राष्ट्रवाद के शोर में दब गया। भारत इस प्रक्रिया का सबसे बड़ा, सबसे मुखर और सबसे दुखद उदाहरण बनकर उभरा।
और इस शोर को घर-घर तक पहुँचाने का काम किया उन डिजिटल मंचों ने, जिन्हें हमने अपनी मुट्ठी में समेट रखा है। सोशल मीडिया के एल्गोरिदम इस तरह बनाए गए हैं कि वे आपकी जेब में रखे उस छोटे से डिवाइस में सिर्फ़ वही दिखाते हैं जो आपको डराता है। उत्तेजित करता है। भड़काता है। क्योंकि भय और क्रोध सबसे ज़्यादा 'एंगेजमेंट' लाते हैं, और एंगेजमेंट से विज्ञापन बिकता है। यानी आपका डर एक उत्पाद है, जिसे बड़ी सफ़ाई से पैक करके आपको ही बेचा जा रहा है। व्हाट्सएप के फ़ॉरवर्ड से लेकर यूट्यूब की रेकमेंडेशन तक, एक पूरा तकनीकी ढाँचा है जो अनजाने में नहीं, बल्कि जानबूझकर सामाजिक ध्रुवीकरण को खाद-पानी देता है। पहले नफ़रत फैलाने के लिए भीड़ जुटानी पड़ती थी। आज एल्गोरिदम यह काम चुपचाप, 24×7, आपके फ़ोन में करता रहता है।
कोरोना काल ने इस अहसास को और भी विषाक्त कर दिया। उस दौरान हमारे आस-पास बहुत से लोग मरे। लेकिन जो बच गए, उनको बस यही भान हुआ कि वे सिर्फ़ भगवान भरोसे बच गए। वे अविश्वास से भर गए। इस महामारी ने जिस एक क्रूर सच्चाई को बड़ी बेरहमी से उघाड़ दिया था वह यह कि संकट के सबसे गहरे क्षणों में राज्य, समाज और बाज़ार, तीनों अपनी सबसे बुनियादी ज़िम्मेदारी से मुँह मोड़ सकते हैं। सड़कों पर हज़ारों किलोमीटर पैदल चलते मजदूर, ऑक्सीजन के लिए तड़पते परिवार, और नदियों में बहती अनगिनत लाशें...ये केवल त्रासदी की तस्वीरें नहीं थीं; ये एक व्यवस्था के नैतिक दिवालियेपन के प्रमाण थे।
इस त्रासदी को और गहरा किया उस चौथे स्तंभ ने, जिसका काम था सच को सामने लाना। मीडिया,जिसकी एक मौलिक परिभाषा होती है, The voice of the voiceless, उसने उन्हीं दिनों में, जब उसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, अपनी आत्मा गिरवी रख दी। सड़कों पर मरते मजदूरों की जगह, प्राइमटाइम पर किसी और का शोर था। ऑक्सीजन के लिए तड़पते परिवारों की चीख़ें जब कैमरों तक पहुँचीं, तो वे प्रसारित नहीं, दबाई गईं। कॉर्पोरेट पूँजी और सत्ता के गठजोड़ ने मीडिया को एक ऐसे दर्पण में बदल दिया, जो समाज का चेहरा नहीं, बल्कि सत्ता का मनचाहा प्रतिबिंब दिखाता है। जब समाज का आईना ही झूठा हो जाए, तो लोग अपनी असली तस्वीर से ही अपरिचित होने लगते हैं। यह सूचना का अकाल नहीं था, यह सूचना का विषाक्तीकरण था।
इस दौर में जो लोग अपने भाग्य से जीवित रह गए, उनके भीतर एक और गहरा और अधिक खतरनाक विचार पनपा कि अगर हम बचें रहेगे, तभी इस दुनिया का हमारे लिए कोई अर्थ होगा। अगर हम ही नहीं रहे, तो उसके बाद हमें इस दुनिया से कोई लेना-देना नहीं। सारे आदर्श, सारे सपने, भविष्य, अपने लोग, समाज.. सब व्यर्थ लगने लगे।
यह केवल हताशा नहीं थी। हताशा तो पहले भी होती थी। लोग झेलते थे, रोते थे, लड़ते थे, फिर उठ खड़े होते थे। लेकिन इस बार कुछ और हुआ। लोगों ने अपनी आँखों से देखा, अपनी आत्मा से महसूस किया और अपनी स्मृति में सहेज लिया कि कोई किसी का साथी नहीं है। यह अकेलापन अब एक भावना नहीं, एक वैचारिक निष्कर्ष बन गया।
जब सामूहिकता की भावना इस तरह टूटती है, तो समाज का सबसे बड़ा नुकसान यह नहीं होता कि लोग उदास हो जाते हैं, बल्कि यह होता है कि वे एक-दूसरे पर भरोसा करना बंद कर देते हैं। और जो समाज आपसी भरोसे के बिना खड़ा हो, वह समाज नहीं, भीड़ है, जिसे जिधर चाहो, हाँका जा सकता है।
ऐसे में सरकारी तंत्र का दायित्व केवल सड़कें बनाना या योजनाएँ चलाना नहीं होता। उसका सबसे बुनियादी काम होता है- समाज में सकारात्मकता और उम्मीद को ज़िंदा रखना। अपने नीति-निर्णयों से यह संदेश देते रहना कि आने वाला कल, आज से बेहतर हो सकता है।
क्योंकि उम्मीद केवल एक भावना नहीं है। यह एक सामाजिक संसाधन है। जब लोगों को लगता है कि उनके बच्चों का भविष्य उनसे बेहतर होगा, तब वे आज की तकलीफ़ सहने की ताकत जुटा लेते हैं। सस्टेनेबल डेवलपमेंट की अवधारणा यहीं से जन्म लेती है। तब वे पेड़ लगाते हैं, जिसकी छाँव में वे खुद कभी नहीं बैठेंगे। यही उम्मीद ही, समाज को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे ले जाने का असली इंजन है। जिसकी चाभी उसके नागरिकों, विशेष रूप से युवाओं के पास रहती है।
युवा स्वभाव से आदर्शवादी होते हैं। हर पीढ़ी अपने समय की बुराइयों से लड़ती है। विशेषकर युवा पीढ़ी। उनके भीतर स्वयं को और अपने आस-पास को पहले से बेहतर बनाने का एक सपना होता है। एक आग होती है। उम्मीद की यह आग ही पूरे देश और समाज को पीढ़ी दर पीढ़ी उन्नत बनाए रखने में ईंधन का काम करता है। यही मानवीय प्रगति का असली स्वरूप है। राज्य की भूमिका इस इंजन और इसके ईंधन को बचाए, बनाए रखने की होती है।
लेकिन जब राज्य इस ईंधन को समाज के विकास में न लगाकर अपनी ख़ुद की सत्ता बचाने के लिए इस्तेमाल करने लगे, तो यह सिर्फ एक राजनीतिक विकृति नहीं, यह एक पूरी पीढ़ी के साथ किया गया सबसे बड़ा अभिशाप बन जाता है।
भारत जैसे दुनिया के कई देशों का वर्तमान सत्ता तंत्र ठीक यही कर रहा है। युवाओं की ऊर्जा को, उनके आक्रोश को, उनकी पहचान की तलाश को, एक सुनियोजित तरीके से 'दूसरे' के विरुद्ध मोड़ा जा रहा है। जो आग परिवर्तन के लिए जलनी चाहिए थी, वह सिर्फ़ सत्ता संरक्षण के नाम पर जलाई जा रही है।
सत्ता में बैठे लोग हमेशा से असुरक्षित रहे हैं। यह कोई नई बात नहीं है। इसके पीछे का कारण प्रायः उनका अनैतिक कर्म ही होता है। और विडंबना यह है कि यही डर उन्हें कुछ हद तक जवाबदेह भी बनाता है। जनता की नाराज़गी का भय, इतिहास में बुरे शासक के रूप में दर्ज होने का भय। यह डर ही बहुत बार उन्हें अच्छी सड़कें बनाने, अस्पताल खोलने, स्कूल चलाने जैसे आधारभूत ढांचे के विकास और उसे उन्नतर बनाने पर मजबूर या मोटिवेट करता है।
लेकिन आज की सत्ता ने कुछ नया किया है। और यही उसकी सबसे घातक उपलब्धि है। उसने अपनी असुरक्षा को, अपने डर को पूरे देश की असुरक्षा और डर के साथ गूँथ दिया है। अब शासक का डर और नागरिक का डर अलग-अलग नहीं रहे। वे एक ही भावनात्मक गाँठ में बंध गए हैं।
यह एक परजीवी रिश्ता है। जिस तरह परजीवी अपने पोषक को जीवित रखते हुए उसकी जीवनशक्ति को धीरे-धीरे चूसता रहता है, उसी तरह भय की यह राजनीति नागरिकों को इतना जीवित रखती है कि वे अपना डर महसूस कर सकें, लेकिन इतना शक्तिहीन बनाती है कि वे उसके विरुद्ध उठ न सकें।
और यह परजीवी तंत्र जीता कैसे है? उन संस्थाओं को खोखला करके, जो कभी नागरिक की ढाल बन सकती थीं। न्यायपालिका की स्वायत्तता जब धीरे-धीरे संकुचित होती है, चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं की निष्पक्षता पर जब सवाल उठने लगते हैं, विश्वविद्यालय जब विचार के केंद्र से अनुपालन के केंद्र बनने लगते हैं, और नागरिक समाज के संगठनों को जब एक-एक करके क़ानूनी शिकंजे में कसा जाने लगता है, तो यह केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं होता। यह उस पूरी संरचना को तोड़ने की प्रक्रिया है, जिस पर खड़े होकर कोई नागरिक सत्ता से सवाल पूछ सकता था। जब सवाल पूछने की जगह ही न बचे, तो नागरिक का डर केवल भावनात्मक नहीं, संरचनात्मक हो जाता है।
अब हर कोई, चाहे वह पहले किसी भी आदर्श पर चलता रहा हो, यही एकमात्र लीक देख रहा है कि सत्ता तंत्र के साथ जुड़े रहो, तो सुरक्षित रहोगे।
यह एक बहुत गहरा मनोवैज्ञानिक परिवर्तन है। पहले लोग सत्ता के साथ इसलिए जुड़ते थे क्योंकि उन्हें लाभ की आशा होती थी। अब वे इसलिए जुड़ रहे हैं क्योंकि उन्हें अपने अस्तित्व के मिट जाने का डर है। आशा और भय दोनों आज्ञाकारिता पैदा करते हैं। लेकिन भय से पैदा हुई आज्ञाकारिता कहीं अधिक गहरी, कहीं अधिक स्थायी और कहीं अधिक ह्यूमिलिएटिंग होती है।
आज के इस असुरक्षित माहौल में हर कोई विजयी पक्ष के साथ खड़ा दिखना चाहता है। हर कोई सत्ता की नज़र में किसी भी तरह आ जाना चाहता है, ताकि जब उस पर संकट आए, तो अपना "पहचान पत्र" दिखाकर बच सके, सर्वाइव कर सके। यह पहचान पत्र कभी-कभी एक पोस्ट होती है, कभी एक नारा, कभी एक चुप्पी और कभी-कभी किसी बेगुनाह की बर्बादी में हाथ बँटाना तक हो सकता है।
लेकिन यह सब केवल डर से नहीं हो रहा। इसमें एक वर्ग की सचेत सहभागिता भी है, जिसे हम ‘मध्यवर्ग’ कहते हैं। उसने बड़ी होशियारी से एक सौदा किया। नागरिक स्वतंत्रता के बदले आर्थिक सुरक्षा की आस, और सामाजिक न्याय की माँग के बदले अपनी जातीय या धार्मिक पहचान का उत्सव। हर असुविधा के लिए उसने सुविधाजनक सहमति दी। संस्थाएँ एक-एक करके कमज़ोर होती रहीं। कुछ देख रहे थे, कुछ सहयोग कर रहे थे। पीड़ित और सहयोगी की भूमिका अक्सर एक ही व्यक्ति में एक साथ रहती है। और यही इस दौर की सबसे असुविधाजनक सच्चाई है, जिसे स्वीकार किए बिना हम किसी भी सस्टेनेबल समाधान पर नहीं पहुंच सकते।
जो समाज डर से चलता है, वह टिकाऊ नहीं होता। यह व्यवस्था बस तब तक चलती है, जब तक कि उसे एक न्यूनतम आवश्यक धक्का मिलता रहता है। और जब यह धक्का मिलना बंद हो जाए, तो वह भरभरा के गिर जाता है। उसके मलबे में सबसे पहले वे लोग ही दबते हैं, जो उस व्यवस्था के कोर में होते हैं। जो सोचते थे कि सत्ता के क़रीब रहकर वे बचे रहेंगे।
आज की परिस्थिति को साफ़ शब्दों में कहें तो हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ डर एक व्यक्तिगत भावना नहीं रहा, वह एक सामूहिक जीवन-पद्धति बन गया है। जीवित बचे रहना, हमारे समय की सबसे बड़ी उपलब्धि बन गई है। लोग वह नहीं बोल रहे हैं जो सोचते हैं। लोग वह नहीं कर रहे जो सही समझते हैं। और सबसे दुखद, लोग धीरे-धीरे यह भी भूलने लगते हैं कि वे कभी कुछ और सोचते और करते भी थे। नागरिकों का "नागरिक बोध" लगभग ख़त्म हो चुका है।
लेकिन यही वह क्षण भी है जब इतिहास करवट लेता है।
जब कोई व्यवस्था अपनी जड़ें जमाने के लिए भय का सहारा लेती है, तो वह दरअसल अपनी कमज़ोरी का ऐलान करती है। क्योंकि जो सच में मज़बूत होता है, उसे डराने की ज़रूरत नहीं पड़ती। और भय पर खड़ी हर इमारत की एक मियाद होती है। वह तभी टूटती है, जब डरे हुए लोग एक-दूसरे की आँखों में अपना ही डर पहचानने लग जाते हैं। उस पहचान में एक अजीब ताक़त होती है, अकेलेपन के टूटने की ताक़त।
इसका समाधान कहां है? शायद वहीं, जहाँ से यह सब टूटा था- आपस में। जिस सामूहिकता को डर ने तोड़ा है, उसे फिर से बुनना होगा। अपने घर से, अपने दायरे से, एक-दूसरे की आँखों में अपना डर पहचानने से। क्योंकि जिस दिन डरे हुए लोग एक-दूसरे से मिलते हैं, उस दिन वे अकेले नहीं रहते। और इसी अकेलेपन का टूटना ही, हर भय-आधारित व्यवस्था का सबसे बड़ा दुश्मन है।
इतिहास गवाह है, ऐसी कोई भी व्यवस्था स्थायी नहीं रही। वे टूटीं, इसलिए नहीं कि कोई बाहर से आया, बल्कि इसलिए कि भीतर से लोगों ने अपने आपको ज़िंदा रखा। अपने होने को स्वीकारा। अपने नागरिक बोध को समझा।
लेकिन यह सामूहिकता बुनना केवल एक भावनात्मक प्रक्रिया नहीं है। यह एक सचेत, रोज़मर्रा का चुनाव है। जिस संस्था पर सवाल उठे, उसके लिए आवाज़ उठाना। जो मीडिया सच बोले, उसे थामे रखना। जो एल्गोरिदम हमें एक-दूसरे से डराए, उसे पहचानकर उससे एक क़दम पीछे हट जाना। किसी बेगुनाह की ख़ामोशी में अपनी आवाज़ मिलाना। यह काम न किसी आंदोलन की प्रतीक्षा माँगता है, न किसी नेता का इंतज़ार। यह वहीं से शुरू होता है जहाँ हम अभी हैं- एक बातचीत में, एक कक्षा में, एक दफ़्तर में, एक व्हाट्सएप ग्रुप में, अपने परिवार और पड़ोस में। क्योंकि जिन संस्थाओं को धीरे-धीरे खोखला किया गया, वह किसी एक व्यक्ति ने या एक दिन में नहीं हुआ। और जो उन्हें फिर से खड़ा करेगा, वह भी कोई एक व्यक्ति या एक दिन में नहीं होगा। यह काम रोज़ का है, छोटा है, और इसीलिए टिकाऊ है।
डर से बड़ी कोई क़ैद नहीं, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि उम्मीद से बड़ी कोई चाबी नहीं। और वह चाबी किसी और के पास नहीं, वह हम में से हर एक के पास है, बस थोड़ी धूल चढ़ गई है। झाड़नी होगी।
©Ravi Kaushal

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