इसके नियम इसलिए कठिन माने जाते हैं क्योंकि कल्पवासी को कड़ाके की ठंड में अपनी सुख-सुविधाएं त्यागकर एक ऋषि की तरह जीवन बिताना होता है। यहाँ इसके मुख्य और सबसे कठिन नियम दिए गए हैं:
1. शारीरिक तपस्या (Physical Hardship)
दिन में तीन बार स्नान: कल्पवासी को माघ महीने की भीषण ठंड में भी दिन में तीन बार (सूर्योदय से पहले, दोपहर और शाम) गंगा या संगम में स्नान करना अनिवार्य होता है।
भूमि शयन (जमीन पर सोना): गद्दे या पलंग का त्याग करना होता है। कल्पवासी को जमीन पर चटाई या कुश बिछाकर सोना पड़ता है।
स्थान सीमा: संकल्प लेने के बाद कल्पवासी पूरे एक महीने तक मेला क्षेत्र (संगम तट) छोड़कर कहीं बाहर (शहर या घर) नहीं जा सकते।
2. आहार के कड़े नियम (Dietary Restrictions)
एक समय भोजन: कल्पवासी को दिन में केवल एक ही बार भोजन करने की अनुमति होती है। बाकी समय सिर्फ फलाहार या जल पर रहना होता है।
स्वयं पाक (खुद बनाना): भोजन सात्विक होना चाहिए और अक्सर नियम यह होता है कि कल्पवासी अपना भोजन खुद पकाते हैं (इसे 'स्वयं पाकी' कहते हैं)।
वर्जित वस्तुएं: प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा, तंबाकू और पान पूरी तरह वर्जित हैं।
3. मानसिक और व्यवहारिक नियम (Mental Discipline)
ब्रह्मचर्य: मन, वचन और कर्म से पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना सबसे महत्वपूर्ण शर्त है।
मौन और सत्य: कम बोलना, झूठ न बोलना और किसी की निंदा (चुगली) न करना। इसे "वाचा संयम" कहते हैं।
क्रोध त्याग: किसी भी परिस्थिति में गुस्सा नहीं करना है और धैर्य बनाए रखना है।
4. आध्यात्मिक दिनचर्या (Spiritual Routine)
तुलसी और जौ का रोपण: अपनी कुटिया या टेंट के बाहर तुलसी का पौधा लगाना और जौ बोना होता है, जिसकी रोज पूजा करनी होती है।
सत्संग और दान: अपना अधिकांश समय भजन, कीर्तन और संतों के प्रवचन सुनने में बिताना होता है। अपनी क्षमता अनुसार 'अन्नदान' करना भी नियम का हिस्सा है।
पिंडदान: अपने पितरों की शांति के लिए तर्पण और पिंडदान करना।
माना जाता है कि जो व्यक्ति इन नियमों का पालन करते हुए 12 वर्षों तक माघ मेले में कल्पवास करता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह शरीर और मन दोनों को 'डिटॉक्स' करने की एक प्राचीन वैदिक प्रक्रिया है।
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