रिपोर्ट पदमाकर पाठक

नई दिल्ली जंतर मंतर पहुंच 𝟖 अक्टूबर क्रांतिकारी छात्र सम्मेलन को बनायें सफल

NEP2020 रद्द करने और सब के लिए स्थायी और सम्मानजनक रोजगार सुनिश्चित करने के लिए संघर्ष करें
आजमगढ़। कुंवर सिंह उद्यान में क्रांतिकारी छात्र कन्वेंशन में शामिल होने को लेकर राहुल विद्यार्थी के नेतृत्व में एक आवश्यक बैठक की गई। बैठक में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को रद्द करने, सभी को स्थायी सम्मान जनक नौकरी देने, एक वैज्ञानिक तर्कसंगत अनिवार्य, मुफ्त और सार्वभौमिक, शिक्षा व्यवस्था के निर्माण की दिशा में अग्रसर होने साथ ही मौजूदा पूंजीवादी व्यवस्था को उजाड़ फेकने बैगर शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन संभव नहीं है इन्ही सब प्रमुख मुद्दों पर चर्चा करते हुए 
8 अक्टूबर को नई दिल्ली में जंतर मंतर पर होने वाले क्रांतिकारी छात्र सम्मेलन को सफल बनाने पर विचार विमर्श किया गया।

आज भारत की शिक्षा-व्यवस्था एक अभूतपूर्व हमले का सामना कर रही है। पिछले तीन दशकों में साम्राज्यवादी-पूंजीवादी व्यवस्था के संकटों से प्रभावित भारतीय समाज में नीतिगत नव-उदारवाद ‘न्यूलिबरलिज्म’ ने पूरे समाज को अपने गिरफ्त में ले लिया है। शिक्षा-व्यवस्था पर हो रहा वर्तमान हमला देश की सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था को खत्म करने तथा उसके निजीकरण और बाजारीकरण की प्रक्रिया में अभिव्यक्त हो रहा है। इस निजीकरण की प्रक्रिया का उद्देश्य कुशल और अकुशल बेरोज़गारों की एक विशाल सेना बनाना है, जो 2014 में भाजपा के केंद्र में सत्ता पाने के बाद से लगातार बढ़ती ही जा रही है। हालांकि, यह प्रक्रिया 1990 के दशक में ही शुरू हो गयी थी और उसके बाद आने वाली सभी केंद्र और राज्य सरकारों ने इसे पूरी बेशर्मी से लागू किया। यह बेहद शर्मनाक है कि फासिस्ट शक्तियां, जिनके नेतृत्व में आज केंद्र की सरकार है, भारत की जनता के साथ-साथ वर्तमान शिक्षा-व्यवस्था पर भी बर्बर और धूर्ततापूर्ण हमले कर रही है, और वर्तमान शिक्षा-व्यवस्था को ‘हिंदुत्व’ की पाठशाला में बदलने का प्रयास कर रही है। निजीकरण के माध्यम से वह न सिर्फ ब्राह्मणवादी, वर्चस्ववादी और साम्प्रदायिक उद्देश्यों का कुत्सित प्रचार कर रही है, बल्कि इसका प्रतिरोध करने वाले सभी विद्यार्थियों और प्रोफेसरों की आवाज़ को भी कुचल रही है। 1947 में सत्ता हाथ में आने के बाद, शासक वर्गों द्वारा प्रचारित किया गया कि प्रारम्भिक शिक्षा को मुफ्त और अनिवार्य बना दिया जाएगा। आज़ादी के बाद ‘कल्याणकारी राज्य’ के लिए चलने वाले जन आंदोलनों के दबाव के कारण, भारत में शिक्षा को एक हद तक सीमित प्रोत्साहन दिया गया, जो कोठारी आयोग के रिपोर्टों में प्रकट भी हुआ। इसमें सार्वजनिक शिक्षा-व्यवस्था, शिक्षा के लिए बजट आवंटन आदि जैसे कई सकारात्मक पहलु थे। लेकिन बाद की नव-उदारवादी नीतियों से यह स्पष्ट हो गया कि ‘कल्याणकारी राज्य’ की अवधारणा को ठन्डे बास्ते में दाल कर शिक्षा को एक बिकाऊ माल बना दिया गया। 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति, जिसे 1992 में संशोधित किया गया था, शिक्षा के छेत्र में नव-उदारवाद की शुरुआत थी। 1993 में निजी विश्वविद्यालय अधिनियम का उद्घाटन भारतीय शासक वर्गों के हितों की सेवा करने के इरादे के साथ ही हुआ था। 2000 में, NDA सरकार के कार्यकाल के दौरान, शिक्षा में नीतिगत सुधार (Policy Framework for Reforms in Education) का ड्राफ्ट मुकेश अंबानी और कुमार मंगलम बिड़ला ने तैयार किया था, जिसमें (अंबानी-बिड़ला रिपोर्ट) उच्च शिक्षा में विदेशी निवेश (FDI) का समर्थन किया गया और निजी विश्वविद्यालयों के लिए लूट का रास्ता खोल दिया गया। यही नहीं इसने शिक्षा संस्थानों में छात्र राजनीति और छात्र संघों का भी पुरज़ोर विरोध किया। दरअसल शिक्षा का निजीकरण 11वीं पंचवर्षीय योजना का मुख्य बिंदु था। इसका उद्देश्य शिक्षा पर सरकार या सामाजिक नियंत्रण को ख़त्म करना ही था। नए मॉडल जैसे कि सार्वजनिक-निजी-साझेदारी (Public Private Partnership), स्ववित्त पोषित पाठ्यक्रम, विदेशी पूँजी का सहयोग, संयुक्त उपक्रम आदि निजीकरण के लुभावने नारे थे। शिक्षा पर सरकारी व्यय में लगातार हो रही कटौती को शिक्षा के जीडीपी में घटते हिस्से में साफ़ देखा जा सकता है जो 1999-2000 में 4.25%, 2004-2005 में 3.68%, 2012-13 में 3.45% से 2023-24 में 2.9% तक गिर चुका है । दूसरी तरफ, स्कूल से लेकर उच्च शिक्षण संस्थानों तक में निजी निवेश की अभूतपूर्व वृद्धि दिखती है। देश के पहले निजी विश्वविद्यालय की स्थापना 1995 में हुई थी तब से आज तक 432 निजी विश्वविद्यालय स्थापित किए गए हैं। इसी बीच, सार्वजनिक विश्वविद्यालयों का निजी विश्वविद्यालयों के साथ साझेदारी भी जारी रही। इसी दौर में “शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009” भी पास हुआ। इस अधिनियम में केवल 14 वर्षों तक के छात्रों (लगभग 8वीं कक्षा) को ही शामिल किया गया है। हालांकि सरकार इसे एक उपलब्धि के रूप में मनाती है और हमेशा उन छात्रों के भविष्य बारे में चुप रहती है, जो इस 14 वर्ष तक के समूह (कैटेगरी) में नहीं आते। यह राज्य की जिम्मेदारी है कि वह पहली कक्षा से लेकर स्नातकोत्तर तक, सभी के लिए, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करे। दुर्भाग्यवश, राज्य ने कभी इस जिम्मेदारी को स्वीकार नहीं किया। उपर्युक्त षड़यंत्र NEP 2020 (नई शिक्षा नीति 2020) के रूप में भारतीय जनता पर थोपी गई। इस योजना ने साम्राज्यवादी -पूंजीवादी शासक वर्ग के हितों के लिए देश की शिक्षा-व्यवस्था को माल के रूप में बेचकर पैदा होने वाले मुनाफे की लूट तथा कुशल और अकुशल मज़दूर की एक विशाल सेना बनाने के रास्ते को खोलने का औज़ार बना दिया। स्कूल स्तर से अनुसंधान स्तर तक छात्रवृत्तियों में कटौती करने के साथ, जहाँ सरकार एक ओर मुफ्त शिक्षा प्रदान करने की अपनी जिम्मेदारी से छुटकारा पा रही है वहीँ दूसरी ओर शोधार्थियों को ऋणों के माध्यम से वित्तीय पूंजी की बलि वेदी पर पटक रही है। ‘ग्रेडेड आटोनोमी’ के नाम पर, राज्य उच्च शिक्षा क्षेत्र के प्रति अपनी वित्तीय जिम्मेदारियों से पूरी तरह से मुक्त होने का प्रयास कर रहा है। कॉलेज और विश्वविद्यालयों को अपने खर्चों का बोझ स्वयं उठाना होगा, जिससे एक बड़े तबके के छात्रों के लिए उच्च शिक्षा पहुंच से बाहर हो जाएगी। इसके अलावा, तीन-साल के स्नातक पाठ्यक्रम को चार साल के स्नातक पाठ्यक्रम में बदलने का एकमात्र उद्देश्य उच्च शिक्षा से सस्ते स्किल्ड लेबर पैदा करना है (विद्यार्थी किसी भी समय पर अपनी शिक्षा छोड़ सकता है, और उसे उतने समय का एक प्रमाणपत्र दे दिया जाएगा) जिनको तेजी से बढ़ते अनौपचारिक श्रम-बाजार में सुपर मुनाफे के लिए निचोड़ा जा सके। याद रखना चाहिए कि सरकार ने मौजूदा श्रम कानूनों में ढांचागत परिवर्तन के पतनशील कदम के रूप में चार श्रम कोड प्रस्तावित किये हैं। इसका उद्देश्य कामकाजी वर्ग से पारम्परिक और गरिमामय रोजगार के हकों, संघ बनाने और अन्य अधिकारों को छीनना है, और साथ ही ‘हायर और फायर’ प्रणाली या अनौपचारिकृत श्रम-व्यवस्था को थोपना है। एक ही धारा के कॉलेजों के मर्जर,और ODL (ओपन और दूरस्थ शिक्षा) की प्रस्तावना का समर्थन करना ग्रामीण और खासकर कमजोर वर्गों के छात्रों को शिक्षा के मूल अधिकारों से वंचित करना है। उच्च शिक्षा में शिक्षकों का पूरी तरह से अनुबंधीकरण -अनौपचारीकरण, जैसा कि NEP20 में प्रस्तावित है, साफ़ दिखाता है कि आने वाले दिनों में शिक्षा-क्षेत्र में स्थायी रोजगार भी नहीं होगा। उसी तरह, स्कूल स्तर की शिक्षा में, 5+3+3+4 व्यवस्था का प्रस्ताव और व्यावसायिक शिक्षा (स्कूल के छात्रों को विशिष्ट बेचने योग्य कौशल सेट्स का प्रशिक्षण देने का उद्देश्य है) वास्तव में शासक वर्ग के लिए सहायक होगा, क्योंकि उनका उद्देश्य कुशल/ अर्ध-कुशल/ अकुशल श्रमिकों की भीड़ उत्पन्न करना है, जो स्कूली स्तर से ही आरंभ किया जा सकता है। इसके अलावा, फासीवादी ताकतों द्वारा भगवाकरण के एजेंडे को द्रुत गति से आगे बढ़ाया जा रहा है। पाठ्यक्रम बदलने से लेकर लगभग हर केंद्रीय विश्वविद्यालय, राज्य विश्वविद्यालय और विभिन्न शैक्षणिक बोर्डों में आरएसएस के खास लोगों नियुक्ति की जा रही है ताकि वे हमारी शिक्षा व्यवस्था पर अपनी पकड़ मजबूत कर सकें। वे अपने धार्मिक ध्रुवीकरण के एजेंडे के साथ (कर्नाटक में हिजाब घटना) पूरी शिक्षा व्यवस्था के भगवाकरण में लगे हैं। लगभग सात दशकों से सरकारी शैक्षिक संस्थाओं के समानांतर आरएसएस द्वारा संचालित अलग-अलग शैक्षिक संस्थान, जैसे विद्या भारती, सरस्वती विद्यालय आदि को नई शिक्षा नीति के प्रस्तावों के अनुसार राज्य द्वारा संचालित व्यवस्था के साथ एकीकृत करने की योजना बनाई जा रही है। पूरे देश पर एक भाषा थोपने का काम जो पहले से जारी था NEP 2020 के माध्यम से और आगे बढ़ाया जा रहा है , NEP 2020 में भी स्थानीय भाषाओं को (शिक्षण के माध्यम के साथ-साथ ऐतिहासिक महत्व की भाषाओं पर विशेष जोर देने के नाम पर) हाशिए पर रखकर, आरएसएस भाषा प्रस्तावों के माध्यम से एक विशेष भाषा को पूरे देश के लोगों पर थोपने की योजना को लागू करने की कोशिश कर रहा है। इसके साथ ही, फासीवादी ताकतें विभिन्न उच्च शिक्षण संस्थानों को अपने पूर्ण नियंत्रण में लेने और इन विभिन्न संस्थानों से उठने वाली असहमति और अन्याय के विरोध में उठने वाली आवाजों को कुचलने पर आमादा है। चाहे इन आवाजों को दबाने के लिए शारीरिक बल, मारपीट और गुंडागर्दी का ही प्रयोग क्यों ना करना पड़े। इसका उदाहरण हम जेएनयू, जामिया-मिलिया, एएमयू आदि विश्वविद्यालयों में पिछले कुछ सालों के दौरान घटी घटनाओं में साफ देख सकते हैं। इसके अलावा, उच्च शैक्षणिक संस्थानों और आईसीएचआर जैसे अनुसंधान निकायों में सभी उच्च पदों को आरएसएस कार्यकर्ताओं और समर्थकों से भरना पूरी शिक्षा व्यवस्था का बड़े पैमाने पर भगवाकरण करने का एक और क्षणयंत्र है। वे इतिहास को अपने "हिंदुत्व" के चश्मे से दिखाने/पढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि हम युवाओं के बीच इतिहास की तर्कसंगत और द्वंद्वात्मक समझ ख़त्म हो जाए। "एनसीईआरटी पाठ्यक्रम को युक्ति संगत, और सुव्यवस्थित" करने की प्रक्रिया और विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में भारी बदलाव से छात्रों के वैज्ञानिक नज़रिये को खत्म कर इसे "हिंदुत्ववादी" चेतना में बदलने का एजेंडा साफ प्रतिबिंबित हो रहा हैं, जो ब्राह्मणवाद, पितृसत्ता, साम्प्रदायिकता, ज़ेनोफ़ोबिया, अंधराष्ट्रवाद, नस्लवाद आदि जैसी प्रतिक्रियावादी विचारधाराओं पर आधारित है। जिस तरीके से आज देश की शिक्षा व्यवस्था पर हमला हो रहा है, रोजगार के अवसर दिन प्रतिदिन अनिश्चित होते जा रहे हैं। हम सभी जानते है, साल 2019 में देश में बेरोजगारी दर पिछले चार दशक में सबसे अधिक थी ( उसके बाद इस पर कोई आंकड़ा जारी नहीं किया गया)। कोविड-19 के बाद से, गांवों और शहरों दोनो जगहों की स्थिति और ख़राब हुई है, औपचारिक रोजगार की गुंजाइश दिन प्रतिदिन घटती जा रही है। ठेका-संविदा और गिग आधारित रोजगार ही आने वाले भविष्य के रोज़गार के मॉडल हैं। अग्निपथ योजना के खिलाफ स्वयंस्फूर्त त्वरित आंदोलन भी इस बात की गवाही देते है। इसके बावजूद, बीजेपी रोजगार देने के बजाए जुमलों, धार्मिक नफरत तथा ध्रुवीकरण के जरिए स्थिति पर परदा डालने को कोशिश कर रही है। हमारा मानना है कि विभिन्न संघर्षरत वर्गों पर शासक वर्ग के हमले को मजबूती देने वाली प्रतिक्रियावादी ताकतों के खिलाफ बिना समझौता किए, सीधे संघर्ष के बिना, शिक्षा और रोजगार के इस गंभीर संकट का सामना नहीं किया जा सकता है। फासीवादी ताकतों के नव -उदारवादी और भगवाकरण के एजेंडे के खिलाफ़, क्रांतिकारी शक्तियों को मजबूती और नई ऊर्जा के साथ लड़ना होगा। न तो संसदवाद और न ही दुस्साहस के जरिए, बल्कि एक क्रांतिकारी दिशा के साथ लगातार प्रगतिशील जन संघर्ष का निर्माण करना हमारा लक्ष्य है। हमारे देश में छात्र आंदोलनों की एक लंबी गौरवशाली परंपरा रही है, जो अक्सर दमनकारी व्यवस्था को क्रांतिकारी रूप से उखाड़ फेंकने के लिए निर्देशित होता है। जिस तरीके से शिक्षा व्यवस्था और विश्वविद्यालयों पर फासीवादी हमले किए जा रहे हैं, क्रांतिकारी लक्ष्य को लेकर चलने वाला एक मजबूत युवा-छात्र जन-आंदोलन इस समय की मांग है। देश के युवा-छात्र वर्ग को अपने अधीन करने के लिए शासकों द्वारा उठाए जा रहे हर कदम के विरुद्ध न केवल समझौताहीन संघर्ष करना, बल्कि वर्तमान साम्राज्यवादी -पूंजीवादी व्यवस्था के साथ-साथ बचे हुए सामंती शोषण की व्यवस्था को उखाड़ फेंकने के लिए निर्णायक संघर्ष करना ,हमारे लिए जरूरी है। क्रांतिकारी ताकत के तौर पर हम यह मानते है की शोषण और उत्पीड़न से मुक्त समाज के निर्माण के लिए, इस बहुस्तरीय शिक्षा व्यवस्था को एक सामान्य शिक्षा व्यवस्था में बदला जा सकता है। इस उद्देश्य से, NEP2020 को निरस्त करने और सब के लिए सम्मानजनक रोजगार की तत्काल मांग पर, हम, क्रांतिकारी छात्र संगठन 8 अक्टूबर, 2023 को जंतर मंतर, नई दिल्ली में एक अखिल भारतीय सम्मेलन का आह्वान करते हैं। छात्र विरोधी NEP2020 को निरस्त करें। शासक वर्ग द्वारा अपनाई जा रही शिक्षा के निजीकरण और व्यावसायीकरण की नीतियों के खिलाफ एकजुट हों। शैक्षणिक संस्थानों और छात्रों पर फासीवादी हमलों का विरोध करें। शिक्षा के भगवाकरण और फासीवादी ताकतों के एजेंडे को लागू करने के लिए पाठ्यक्रम में अवैज्ञानिक बदलाव का विरोध करें। सभी के लिए स्थायी और सम्मानजनक रोजगार सुनिश्चित हो। शिक्षण संस्थानों में जाति और लिंग आधारित भेदभाव और अत्याचारों का विरोध करें।
विभिन्न छात्रवृत्तियों को रोकने एवं कटौती और शिक्षण संस्थानों में बेतहाशा फीस वृद्धि का विरोध करें। छात्र संघ बनाने के अधिकार के लिए और प्रत्येक शैक्षणिक संस्थान में बहस और असहमति के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए लड़ें। सरकारी स्कूलों को बंद करने/विलय करने या उन्हें कॉर्पोरेट घरानों, धार्मिक निकायों और गैर सरकारी संगठनों को आउटसोर्स/पट्टे पर देने/बेचने/नीलामी करने के सभी निर्णयों को वापस लो। सरकार को सभी धार्मिक गतिविधियों से अलग करें।

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