प्रयागराज। मंच पर चमकती तलवारें, गूंजती रणभेरी और अन्याय के खिलाफ स्वराज का संकल्प लेते 12 वर्ष के बालक छत्रसाल...। यह दृश्य देखकर एनसीजेडसीसी का सभागार दर्शकों की करतल ध्वनि से गूंज उठा। अवसर था उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार एवं जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी, मध्य प्रदेश के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित तीन दिवसीय जनजातीय उत्सव के दूसरे दिन का, जहाँ नृत्य-नाटिका "महाबली छत्रसाल" के मंचन ने बुंदेलखंड के गौरवशाली इतिहास को सजीव कर दिया।
कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि प्रो. पतंजलि मिश्रा, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, विशिष्ट अतिथि श्री दयानिधि उर्मलिया, संगठन मंत्री, ई.आर.डी.सी. केन्द्र, नागपुर तथा उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र के निदेशक सुदेश शर्मा, उपनिदेशक डॉ. मुकेश उपाध्याय एवं सलाहकार कल्पना सहाय ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर किया।
मुगलों से बुंदेलखंड को स्वतंत्र कराकर अंर्तध्यान हो गए छत्रसाल :
नाटक का पहला दृश्य 17वीं शताब्दी की उस घटना से मंच पर प्रस्तुत हुआ जब मुगलों से संघर्ष कर रहे चंपतराय मोर पहाड़ी पर छिपे हुए थे जहां महाराजा छत्रसाल का जन्म होता है। बचपन से ही पराक्रमी छत्रसाल बड़े होकर अपनी माटी को मुगलों से मुक्त कराने के लिए संघर्ष करने लगते हैं। शिवाजी से एक मुलाकात के बाद उनका जीवन परिवर्तित होता है और फि र वे सीमिति संसाधनों के बावजूद अपनी सेना का गठन करते हैं। अपनी बुंदेली धरती को मुगलों से मुक्त कराते हैं। नाटक में महाराजा छत्रसाल की गुरु प्राणनाथ से हुई भेंट, पेशवा बाजीराव से मिले सहयोग, मस्तानी की नृत्यकला, महाराज के काव्य प्रेम और न्याय व्यवस्था को भावपूर्ण तरीके से प्रस्तुत किया गया। कई प्रसंगों पर दर्शकों के आंसू छलके तो कई बार रोंगटे खड़े हो गए। अंत में बुंदेली धरती को मुगलों की दाशता से मुक्त कराकर महाराजा छत्रसाल सशरी अंर्तध्यान हो गए। इस अंतिम दृश्य ने लोगों को महाराजा छत्रसाल के संपूर्ण व्यक्तित्व से जोड़ दिया। नाटक का निर्देशन किया था चंद्र माधव बारीक ने तथा नाटक का लेखन भगवती लाल (राज पुरोहित) ने किया, मिलिंद त्रिवेदी ने संगीत निर्देशन और अतुल मिश्रा ने प्रकाश परिकल्पना का दायित्व निभाया।
बुंदेली राई नृत्य, आल्हा गायन, युद्ध दृश्य, तलवारबाजी, भव्य प्रकाश संयोजन और जीवंत संगीत ने प्रस्तुति में चार चांद लगा दिया। अंतिम दृश्य में स्वाभिमान, स्वतंत्रता और मातृभूमि के प्रति समर्पण का संदेश दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर दिया।
ऐसा लगा जैसे छत्रसाल जीवित हो उठे हों : कलाकारों का अभिनय ,मंच सज्जा और कहानी को उतारने का तरीका इतना मनोहारी था कि ऐसा लगा जैसे महाराजा छत्रसाल जीवित हो उठे हों। आशीष ओझा ने छत्रसाल, पीयूष पांडा ने सूत्रधार, साहिल श्रीवास्तव ने औरंगजेब, धन्नू लाल सिन्हा ने चंपत राय, ज्योति रैकवार ने लाल कुंवारी तथा योगेश तिवारी ने महावीर मामा की भूमिका का सशक्त निर्वहन कर दर्शकों से भरपूर सराहना अर्जित की।
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